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युवा
एवं राजनिति
समय-समय पर युवाओं के द्धारा
राजनिति में हिस्सेदारी को लेकर समाज के प्रबुद्ध एवं वरिष्ट लोगों
द्धारा प्रश्न उठाये जाते रहें हैं। उनका तर्क रहा है कि युवओं
जिनका कि मूल उद्देश्य विघा-अध्ययन करना है, यदि राजनीति में
सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, तो क्या वे अपने मूल-उद्देश्य से
भटक नहीं जायेगें?? और क्या यह कार्य उनके भविष्य निमार्ण में
बाधक नहीं होगा?? हम भी यह मानते हैं कि यूवाओं का मुख्य
उद्देश्य पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगाना
चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार
के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना भी शिक्षा में शामिल होना
चाहिए, ताकि वे राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में अपनी
महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सके। क्योंकि ऎसी शिक्षा
व्यवस्था जो युवाओं को देश की सरंचना निमार्ण में कोई भागीदारी
नहीं देती - उन्हें व्यवहारिक रूप से अकर्मण्य बनाती है उसे हम
पूर्णतः साथर्क नहीं समझते हैं। वैसे भी एक प्रजातांत्र्कि
राष्ट्र में प्रत्येक नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से
राजनीति तथा राष्ट्रीय कार्यप्रणाली में भगीदारी निभाता है और
ऎसे में राजीव गांधी द्धारा प्रदत्त 18 वां के व्यस्क मताधिकार
से छात्रों की भागीदारी तो स्वतः ही स्पष्ट हो जाती है। अतः
उपरोक्त परिस्थिति में राष्ट्रीय नेतृत्व का दायित्व है कि
युवाओं में जिन्हें कल देश की बागडोर हर स्तर पर अपने हाथों
में लेनी है - नेतृत्व क्षमता पैदा करें, उन्हें उनके
राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाये, उन्हें
साम्प्रदायिक व प्रथक्तावादी ताकतों के विरूद्ध एकजूट करें,
उन्हें लोकतांत्र्कि कार्यप्रणाली से अवगत करायें और साथ ही
राष्ट्रीय समस्या के समाधान में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करें।
यदि व ऎसा नहीं करते है तो व न सिर्फ राष्ट्र के साथ ही
विश्वासघात करेंगें, बल्कि यह देश की भावी पीढ़ी के साथ भी घोर
अन्याय होगा। क्योंकि ऎसा न करने पर भारतवर्ष में एक ऎसी
नेतृत्व शून्येता पैदा होगी जो देश को अनजाने अंधकारमय भविष्य
की ओर धकेल देगी। इससे अतिरिक्त युवाओं को भी चाहिए कि वे पढ़े,
परन्तु साथ ही राष्ट्रीय गतिविधि में भी सक्रिय भागीदारी निभायें
और अपने अधिकार और जिम्मेदारियों को समझते हुए राष्ट्रीय
परिपेक्ष्य में " जब, जहां, जितनी आवश्यकता हो अपना संपूर्ण
योगदान दें। ऎसा करने पर ही वे भारत वर्ष को उन्नति के
चरमोत्कर्ष पर ले जा सकने में सफल हो सकेंगे तथा उस राष्ट्र का
निर्माण कर सकेंगे जो नेहरू-गांधी के सपनों का राष्ट्र था।
जय हिन्द जय भारत
(तनवीर अहमद
'सन्नी')
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